Top 2 amazing Jaishankar Prasad ki Kahaniyan 2020 | 100% Incredible

श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के प्रसिद्ध कवि के साथ-साथ एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार भी थे। आज हम जानेंगे Two Best Jaishankar prasad ki kahaniyan


Jaishankar Prasad ki Kahaniyan


 1.आकाशदीप

2.पुरस्कार

उससे पहले हम उनके बारे में थोड़ा जानते हैं


Jaishankar Prasad ka Jivan Paricahy


 

   जन्म    काशी
   पिता   देवी प्रसाद
   मृत्यु
  1937 ई.

Two Best Jaishankar prasad ki kahaniyan-

1. आकाशदीप (Auther – Jaishankar prasad)



Jaishankar Prasad Kahaniyan


 भारत के छोटे से गांव चंपा नगरी में चंपा नाम की क्षत्रिय बालिका रहती थी । उसके पिता वाणी मणिभद्र गांव के नाव के प्रहरी थे ।

मणिभद्र भारत से अन्य देशों जैसे जावा, सुमात्रा , और अन्य दीपों से व्यापार करते थे। चंपा तथा चंपा की मां भी उसके पिता के साथ व्यापार में जाया करते थे। परंतु किसी कारणवश माता की मृत्यु के बाद वह हर दिन पिता के साथ व्यापार पर जाने लगी ।

एक बार वह ऐसे ही व्यापार पर जा रहे थे कि बुद्धगुप्त नाम के व्यक्ति ने अपने दल के साथ उनकी नाव पर हमला कर दिया। जिस कारण उसके पिता की मृत्यु हो गई, और बुद्ध गुप्त ने चंपा को अपना बंदी बना लिया। क्षत्रिय गुप्तबुद्ध चंपा से प्रेम करने लगा ।

यह देख महा नाविक ने चंपा व बुद्धगुप्त को बंदी बनाने का प्रयत्न किया इससे बुद्धगुप्त और महानाविक में युद्ध हो गया , पर बुद्ध गुप्त जीता और महानाविक ने उसे शमा याचना मांगली।

पोत पर बुद्धगुप्त का कब्जा हो गया चंपा और बुद्धगुप्त पोत को लेकर एक नये द्वीप पहुंचे जिसका नाम उन्होंने चंपा द्वीप रखा । परन्तु चंपा के मन में बुद्धगुप्त के प्रति पिता के प्रतिशोध की भावना जागृत थी
पर कभी-कभी उसके लिए प्रेम भी उमरता।

बुद्धगुप्त ने चंपा के लिए एक महल बनवाया और उससे विवाह करने का आग्रह किया पर चंपा ने उसे अस्वीकार नहीं किया चंपा महल मे बैठकर आकाशदीप ही चलाते रहती चंपा ने बुद्ध गुप्त से कहा,

कि दीप दिखाकर अपने मृत पिता को मार्ग दिखाती है जिससे उनकी आत्मा को मार्ग मिले ।बुद्धगुप्त ने चंपा की इस इच्छा को समझकर चंपाद्वीप में एक विशाल प्रकाश स्तंभ बनवाया।

1 दिन चंपा अपनी सखी जया के साथ विहार कर रही थी, कि बुद्धगुप्त अपनी नाव लेकर चंपा के पास गया ,
चंपा उसकी नाव में आ गई । दोनों विहार करते करते बहुत दूर निकल गए चंपा के मन में उस दिन प्रतिशोध की भावना निकल गई।

और उसने कटार फेंक दी बुद्धगुप्त से प्रेम करते हुए भी वह उसके साथ भी विवाह नहीं कर पाती,
बुद्धगुप्त चंपा से भारत चलने को कहता है परंतु चंपा मना कर देती है।

बुद्धगुप्त भारत लौटता है , चंपा आंसू भरे आंखों से उसको देखते रहती है । चंपा कुछ दिन बाद से नियमित रूप से आकाश दीप जलाकर बुद्ध गुप्त की प्रतीक्षा करती है,

पर वह नहीं आता और कुछ सालों बाद उसकी मृत्यु के बाद तक चंपा दीप के निवासी उसकी याद में दीप जलाते रहते हैं अंत में वह आकाशद्विप स्तम्भ भी खत्म हो गया। और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

यह कहानी Best Jaishankar prasad ki kahaniyo में से एक है यहां आकाशद्विप जयशंकर प्रसाद की कहानी इतनी प्रसिद्ध हुई , कि इसे NCERT की book में भी छापा गया।


2. पुरस्कार (Auther – Jaishankar prasad)


कौशल राज्य में 1 दिन सभी लोग कृषि उत्सव मना रहे थे, उस गांव की प्रथा थी, कि उस दिन राजा किसी भी गांव वाले की जमीन में खुदाई और बुवाई करके इंद्र देव को प्रसन्न करते थे।

और बदले में जमीन के मालिक को ढेर सारी स्वर्ण मुद्राएं दे दी जाती थी , ताकि वह अपना जीवन निश्चिंत रूप से व्यतीत कर सके ।

पर राजा जो खेल लेते थे, उसकी देखभाल भी उसी जमीन के मालिक को करनी पड़ती थी।
इस बार से कृषि उत्सव में राजा द्वारा इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए वीर सिंह की कन्या मधुलिका का खेत चुना गया ।

खेत की खुदाई में मधुलिका ने राजा का साथ दिया , परंतु जब सेनापति ने उसको खेत के बदले की स्वर्ण मुद्राएं देने का प्रयास किया तो उसने उसे लेने से मना कर दिया जबकि वह मूल्य उसकी जमीन का चौगुना था ।

इस पर सेनापति ने कहा अबोध कन्या ! तुम इसे लेने से मना क्यों कर रही हो ?  इस पर मधुलिका ने सेनापति से कहा, राजा को जमीन देने में ना मेरा न पहले कोई विरोध था, और ना है।

किंतु मैं इसका मूल्य स्वीकार नहीं कर सकती मुझे क्षमा करें और उसने सोने की मुद्रा नहीं ली।

वहां एक मगध के राजकुमार भी आए हुए थे और वह सब घटना देख रहे थे , मधुलिका एक स्वाभिमानी और अत्यंत सुंदर थी। राजकुमार उसकी सुंदरता में उससे प्रेम कर बैठा,

उत्सव समाप्त होने के बाद सब वहां से चले गए उसके बाद मधुलिका एक पीपल के पेड़ के नीचे जाकर सो गई।

रात बहुत हो चुकी थी , अचानक मधुलिका की आंख खुली, और राजकुमार को समीप देखकर वह चौंक गयी। राजकुमार ने उससे अपने प्रेम की बात कही,

परन्तु मधुलिका ने राजकुमार से कहा – राजकुमार आप ठहरे नंदन विहारी, और मैं एक परिश्रम करने वाले कृषक की बेटी। आप कृपया मेरा उपहास उड़ाना बंद करें ।

राजकुमार यह सब सुनकर निराश होकर वहां से चल दिया । और मधुलिका भी भारी आंखों से यह सब देखती रही ,

अब लगभग इस घटना को 3 साल गुजर चुके थे और मधुलिका बहुत ही करीबी मैं गुजारा कर रही थी।

वह अपना गुजारा करने के लिए दूसरों के खेतों में काम पर जाने लगी और सभी अन्य कृषक स्वाभिमानी मधुलिका को बहुत ही इज्जत करते थे।

एक दिन शाम का समय था मधुलिका अपने घर पर थी, आसमान में काले काले बादल छाए हुए थे फिर कुछ देर बाद बरसा और ओलों की बरसात शुरू हो गई, यह देखकर मधुलिका को 3 साल पहले का मगध के राजकुमार का मधुलिका को प्रेम का आग्रह करना याद आया ,

और उसकी आंखें भर आई। इस दौरान दरवाजे पर एक खटखट की आवाज सुनकर वह दरवाजा खोलती है, और बाहर मगध की राजकुमार खड़े हैं , उसके आश्चर्य की कोई भी सीमा नहीं रही ।

उसने राजकुमार से पूछा आप यहां कैसे ?
राजकुमार ने बताया अब वह मगध का विद्रोही राजकुमार है और भी राजकुमार ने मधुलिका को अपनी पूरी कहानी बताई।

राजकुमार मधुलिका से कहता है कि वह एक नए राज्य की स्थापना करना चाहता है और उसको अपनी रानी बनाना चाहता है , मधुलिका बहुत खुश हुई। और उसने कहा आप जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूंगी ।

मधुलिका कौशल राज्य के राजा से मधुलिका द्वारा दी गई जमीन के बदले में दुर्ग के पास कुछ जमीन मांग करती है,  कौशल के राजा कुछ देर सोच कर उसको जमीन देने का निर्णय लेते हैं।

वह जमीन राजकुमार के सैनिकों के लिए शिविर का काम करती है।

राजकुमार ने मधुलिका से कहा वह बहुत जल्दी कौशल का राजा होगा और मधुलिका उस की रानी। यह सुनकर वह बहुत खुश हो जाती है , परंतु वह यह भूल जाती है कि केवल 100 सैनिकों के साथ यह संभव नहीं!

फिर रात होने पर वह अपने घर लौट जाती है रात को वह राजकुमार के बारे में सोचती है , और उसे राजकुमार पर शंका होने लगती है साथ ही इस बात की ग्लानि भी होने लगती है

कि वह सिंह मित्र की कन्या  होकर कौशल राज्य के विरोधियों का साथ दे रही है , इस बात से उसका मन बदल जाता है और वह सीधे दरबार में जाती है और राजा को सारी बातें साफ-साफ बता देती है और अरुण यानी राजकुमार बंदी बना लिया जाता है।

राजा उसे प्राण दंड की सजा सुनाते हैं राजा की सहायता के लिए राजा मधुलिका को पुरस्कार देना चाहते हैं और पूछते हैं – हे कन्या तुम्हें क्या चाहिए?

तब मधुलिका कहती है मुझे भी  प्राण दंड दे दीजिए , इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए । और वह अरुण के साथ जाकर खड़ी हो जाती है।

यह भी Best Jaishankar prasad ki kahaniyan me se ek है. यह भी NCERT में छापी गई है।


Jaishankar prasad ki rachnaye-


कामायनी
यह जयशंकर प्रसाद की बहुत ही आकर्षित करने वाली रचना है ।

आंसू
यह जयशंकर प्रसाद का किए काव्या इसमें दुख को दर्शाया है।

लहर
यह जयशंकर प्रसाद की भावात्मक काव्य संग्रह है

झरना
यह जयशंकर प्रसाद की छायावादी कविताओं में से एक है

कहानी
आकाशदीप ,इंद्रजाल , प्रतिध्वनि, आंधी आदि जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं हैं

उपन्यास
कंकाल तितली इत्यादि


Jaishankar prasad ki antim rachna:


Shri Jaishankar prasad ki antim rachna titli ( तितली ) thi।


Jaishankar prasad ka jivan parichay:


जयशंकर प्रसाद अनेक विषयों के एवं भाषाओं के अखंड प्रतिभाशाली कवि थे। इन्होंने नाटक , उपन्यास , कहानी, निबंध आदि लेखन किए।

जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित परिवार में 1889 ई. को हुआ उनके पिता की मृत्यु हो जाने के बाद इनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। वह बड़े मिलनसार थे,

किंतु दानशीलता के कारण वे ऋणी होते गए, और पिता की संपत्ति बेचकर उन्होंने अपना ऋण चुकाया। अंत में 1937 में T.B. के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

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