Shri Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi | श्री हनुमान चालीसा

हनुमान जी की कृपा अपने ऊपर बनाने के लिए पढ़िये यह Shri Hanuman Chalisa. श्री हनुमान चालीसा पढ़ने के बाद हनुमान जी का आशीर्वाद सदा आपके ऊपर बना रहेगा।

आज आप श्री हनुमान चालीसा के साथ साथ, हनुमान जी की कुछ कहानियां भी पढेंगे, जिससे आपको हनुमान जी की भक्ति की शक्ति का आभास होगा।


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Hanuman Chalisa


◆ हनुमान चालीसा ◆

 || दोहा ||

श्री गुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुर सुधार

बरनऊँ रघुवर विमलजसु,जो दायक फल चार |

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवनकुमार

बल-बुद्धि-विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ||


|| चौपाई ||

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,

जय कपीश तिहुँ लोक उजागर || 1 ||

राम दूत अतुलित बल दामा,

अंजनिपुत्र पवनसुत नामा || 2 ||

महावीर विक्रम बजरंगी,

कुमति निवार सुमति के संगी || 3 ||

कंचन बरन विराज सुवेसा,

कानन कुंडल कुंचित केसा || 4 ||

हाथ बज्र औ ध्वजा विराजे,

कांधे मूज जनेऊ साजे || 5 ||

संकर सुवन केसरी नंदन,

तेज प्रताप महाजगबन्धन ||6 ||

विद्यावान गुनी अति चातुर,

राम काज करीबे को आतुर || 7 ||

प्रभुचरित्र सुनिबे को रसिया,

राम लखन सीता मन बसिया || 8 ||

सूक्ष्मरूप धरि सियहिं दिखावा,

विकट रूप धरि लंक जरावा || 9 ||

भीम रूप धरि असुर संहारे,

रामचन्द्र के काज संवारे || 10 ||

लायंसजीवन लखन जी आए,

श्री रघुवीर हरषि उर लाए ||11 ||

रघुपति किन्हीं बहुत बढ़ाई,

तुम मम प्रिय भ्रातहिं सम भाई || 12 ||

सहस्र बदन तुम्हरो जश गावें,

असकहिं श्रीपति कंठ लगावैं || 13 ||

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा,

नारद सारद सहित अहीसा || 14 ||

जम कुबेर दिकपाल जहां ते,

कवि को विद सके कहाँ ते || 15 ||

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा,

राम मिलाय राजपद दीन्हा || 16 ||

तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना,

लंकेश्वर भये सब जग जाना || 17 ||

जुग सहस्र योजन पर भानु ,

लील्यो त्राहि मधुए फल जानु || 18 ||

तुम्ह मुद्रिका मेलि मुख माही,

जलधि लाँघि गए अचरज नाही || 19 ||

दुर्गम काज जगत के जेते,

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते || 20 ||

राम दुआरे तुम्ह रखवारे,

होतन आज्ञा बिनु पैसारे || 21 ||

सब सुख लहै तुम्हारी सरना,

तुम रक्षक काहू को डरना || 22 ||

आपन तेज सम्हारो आपे,

तीनों लोक हांकते काँपै || 23 ||

भूत-पिशाच निकट नहीं आवें,

महावीर जब नाम सुनावैं || 24 ||

नासे रोग हरे सब पीरा,

जपत निरन्तर हनुमत बीरा || 25 ||

संकट तै हनुमान छुडावै,

मन क्रम बचन ध्यान जो लावैं || 26 ||

सब पर राम तपस्वी राजा,

सब के काल सकल तुम साजा || 27 ||

और मनोरथ जो कोई लावै,

सोई अमित जीवन फल पावै || 28 ||

चारों जुग परताप तुम्हारा,

है परसिद्ध जगत उजियारा || 29 ||

साधु संत के तुम रखवारे,

असुर निकन्दन राम दुलारे || 30 ||

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता,

असवर दीन जानकी माता || 31 ||

राम रसायन तुम्हरे पासा,

सदा रहो रघुपति के दासा || 32 ||

तुम्हरे भजन राम को भावैं ,

जनम जनम के दुख बिसरावै || 33 ||

अनंतकाल रघुपुरजाई,

जहां जन्म हरि भक्त कहाई || 34 ||

और देवता चित्त न धरई,

हनुमत सेई सर्व सुख करई ||35 ||

संकट कटै मिटे सब पीरा,

जो सुमिरै हनुमत बलवीरा ||36 ||

जै जै जै हनुमान गुसाईं,

कृपा करहु गुरु देवकी नाईं || 37 ||

जो सत बार पाठ कर कोई,

छुटहि बन्दि महासुख होई || 38 ||

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ,

होय सिद्ध ताकि गौरीसा || 39 ||

तुलसीदास सदा हरी चेरा,

कीजै नाथ हृदय महा डेरा ||40 ||


|| दोहा ||

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरती रूप |

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहुँ सुर भूप ||

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हनुमान चालीसा का जप करने के पश्चात Hanuman Chalisa की आरती का पाठ करना शुभ माना जाता है। हनुमानजी बड़े ही उदार हैं कहा जाता है, कि जो भी सच्चे मन से हनुमान चालीसा की आरती का पाठ करता है, उस पर हनुमानजी अपनी कृपादृष्टि बनाए रखते हैं।


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” हनुमान चालीसा आरती “

आरती कीजै हनुमान लला की,

दुष्टदलन रघुनाथ कला की।

जाके बल से गिरिवर काँपै,

रोग दोष जाके निकट न झांके ।

अंजनिपुत्र महाबलदाई,

सन्तन के प्रभु सदा सहाई।

दे बीड़ा रघुनाथ पठाए,

लंकाजारि सिया सुधि लाए।

लंका सो कोट समुद्र सिखाए,

जात पवन सुत बार न लाई।

लंका जारि असूर संहारे,

सियाराम जी के काज सँवारे।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे,

आनि संजीवन प्रान उबारे।

पैठी पताल तोरि जमकारे,

अहिरावन की भुजा उखारे।

बाएं भुजा असुर दल मारे,

दहिने भुजा सन्त जन तारे।

सुर नर मुनि आरती उतारे,

जय जय जय हनुमान उचारे।

कंचन थार कपुरलौ छाई,

आरती करत अंजनामाई।

जो हनुमानजी की आरती गावै,

बसि बैकुंठ परम् पद पावै ।

लंकविध्वन्स किन्हीं रघुराई,

तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।

आरती कीजै हनुमान लला की,

दुष्टदलन रघुनाथ कला की।।

आपने पढ़ी Shri Hanuman Chalisa, अब पढ़िए हनुमान जी की कुछ प्रख्यात कहानियां। जिससे आपकी हनुमान जी के प्रति भक्ति और प्रबल होगी।

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Hanuman Chalisa Story


” हनुमान जी और शनिदेव “


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     रामायण काल की बात है। जब रावण का पुत्र मेघनाद पैदा हुआ तो सबसे अधिक शक्तिशाली ग्रह शनि हो गया था। पुरे आकाश में उन्हीं का वर्चस्व था।

और मेघनाद की कुंडली में भी शनि आ गए। शनि के कुंडली पर आ जाने से मेघनाद का अमर होना अनिश्चित हो गया। यह देखकर रावण को बहुत ही क्रोध आया।

    रावण बहुत बड़ा योगी था। उसने अपनी योग विद्या का उपयोग किया और पहुंच गया शनिदेव के पास। वह शनिदेव के पास गया और मेघनाद के जीवन से चले जाने का आग्रह किया।

जब शनिदेव नहीं माने तब उसने छल का प्रयोग किया। छलपूर्वक उन्हें बन्दी बनाकर अपने कारागार में डाल दिया। ताकि उनका प्रभाव मेघनाद के जीवन से कम हो सके।

 समय बीतता चला गया।

मेघनाद भी बड़ा हो गया। फिर एक बार रावण सीता मैया को बंदी बना लाया। माता सीता की खोज में भगवान राम ने हनुमानजी को अपनी एक अंगूठी देकर लंका जाने को कहा।

हनुमानजी उड़कर लंका पहुंच गए। परन्तु वहां जाकर उन्होंने देखा कि शनिदेव को तो कैद कर रखा है उन्होंने बाहर खड़े सैनिकों से द्वंद्व किया और उन्हें पराजित कर दिया।

वैसे बचपन मे शनिदेव और हनुमानजी ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी लेकिन दोनों की कभी नही बनी। क्योंकि बचपन में शनिदेव थोड़ा गुस्सैल प्रकृति के थे।

   हनुमानजी जी ने शनिदेव से उनके यहां पहुंचने का कारण पूछा। तब शनिदेव ने बताया कि, रावण ने अपने पुत्र को अमर बनाने के लिए मुझे यहां छल द्वारा कैद कर के रख है।

लेकिन वह नहीं जानता कि अब उसका और उसके पुत्र का अंत निश्चित ही हैं।

तब हनुमानजी ने कहा, ” सही कह रहे हैं आप रावण औऱ उसके कुल का अंतिम समय अब निकट आ ही गया है। धूर्त रावण ने छल के प्रयोग से माता सीता का हरण कर लिया है।

मेरे प्रभु राम ने मुझे उन्हें देखने को भेजा है। हो सके तो मैं माता सीता को यहां से लेकर जाऊंगा। मैं माता सीता को मिलने से पहले आप को ऊपर तक छोड़ के आता हूँ।”

  हनुमानजी ने शनिदेव को अपने कन्धों में बिठाया और उड़कर ऊपर आकाश की ओर ले गए। रस्ते में शनिदेव ने कहा, “मैं अगर तुम्हारी किसी भी प्रकार की सहायता कर सकूं,

तो मुझे जरूर बताना। मैं आज तुम्हारा ऋणी हो गया हूँ। तुम्हें मुझसे कुछ चाहिए तो कहो। तब हनुमानजी ने कहा, ” आपकी दया तो सभी जानते हैं,

लेकिन आपके क्रोध से भी आज तक कोई नहीं बच सके हैं। मैं चाहता हूं कि जब कलियुग आए तब मेरे भक्तों पर आपके क्रोध का सम्पूर्ण प्रभाव न हो।”

तब शनिदेव बोले, ” ठीक है यदि कोई तुम्हारी अराधना करेगा तो मैं उसे परेशान नहीं करूंगा।”

   यही कारण है कि शनिवार के दिन न केवल शनिदेव की, बल्कि हनुमानजी की भी पूजा की जाती है। औऱ हनुमानजी और शनिदेव दोनो ही,

जो उनकी आराधना सच्चे हृदय से करता है उनकी सदैव सहायता करते हैं और उन पर कभी भी विपत्तियां नहीं आती है।

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” हनुमानजी पर साढ़े साती “


हनुमान चालीसा

    यह तब की बात है, जब कलियुग का प्रारंभ हो गया था। हनुमानजी को तो भगवान राम से वरदान मिला था कि वे जब तक चाहें धरती पर निवास कर सकते हैं।

    अतः भगवान राम के वरदान को प्राप्त कर हनुमानजी अपने आराध्य राम का नाम जपते जपते संसार में विचरण करने लगे। उनका शरीर अब दुर्बल हो चुका था।

  जब एक दिन वह अपनी साधना में व्यस्त थे तब शनिदेव वहां आ पहुंचे। शनिदेव ने हनुमानजी से कहा, ” समय के साथ आपका शरीर दुर्बल हो चुका है और मेरा शरीर प्रबल हो चुका है।

आपको इस संसार से मुक्ति दिलाने के लिए ही मैं यहां आपके पास आया हूँ। मैं आपके ऊपर साढ़े साती बनकर आऊंगा और आपको इस संसार से मुक्ति दिलाऊंगा।”

 हनुमानजी मुस्कुराए और बोले, ” शनिदेव मैं भगवान राम का भक्त हूँ। मेरे मन मस्तिष्क और हृदय में केवल भगवान राम बसे हुए हैं मेरे और भगवान राम के मध्य कोई भी नही आ सकता।

इसलिए आप यहां से चले जाइए।”

शनिदेव नहीं माने और हनुमानजी से कहा, ” कोई बात नहीं आप अपने प्रभु का सुमिरन करते रहीए ,लेकिन मुझे अपना कार्य करने से मत रोकिए। मैं आपको इस नश्वर संसार से मुक्ति दिलाना चाहता हूँ।

अतः प्रथम के ढाई वर्ष मैं तुम्हारे मस्तक पर विराजमान होऊँगा। जिससे कि तुम्हारा मन विचलित हो सके। औऱ तुम नकरात्मकता की ओर चल पड़ो। अगले ढाई वर्ष मैं तुम्हारे हृदय पर वास करूँगा,

ताकि तुम्हारे हृदय से सभी संसार की भावनाए नष्ट कर सकूं। और तुम्हारे शरीर में रोगों की प्रविष्टि हो सके। अंगले ढाई वर्ष मैं तुम्हारी जंघा पर निवास करूँगा ताकि तूम चल फिर नहीं सको ,

और इस प्रकार तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाएगा और तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।”

हनुमानजी बोले, ” मेरे शरीर में भगवान राम के सिवा कोई और प्रवेश नहीं कर सकता।”

लेकिन शनिदेव नहीं माने और अपनी जिद पर अड़े रहे तब हनुमानजी ने शनिदेव से कहा कि आप आजमाकर देख लीजिए। आप मेरे शरीर पर अधिक टिक नहीं पाएंगे।

  शनिदेव हनुमानजी के मस्तक पर विराजमान हो गए। तब एक दिन हनुमानजी ने अपने मस्तक पर एक बड़ा सा पर्वत उठाकर रख लिया। तब मस्तक पर बैठे शनिदेव को परेशानी होने लगी,

और उन्होंने हनुमानजी से कहा, “आप यह क्या कर रहे हैं।”

Shree Hanuman Chalisa in hindi Story Motivational part-  हनुमानजी बोले, ” मेरे सर पर खुजली हो रही है।” यह कहकर हनुमानजी ने एक और पर्वत उठाकर अपने सर पर रख लिया।

जब शनिदेव ने फिर आपत्ति उठाई तो,

हनुमानजी ने एक पर्वत और उठाया और अपने सर पर रख लिया। शनिदेव को पीड़ा होने लगी और वे बोले,”हनुमानजी कृपया करके इन पर्वतो को हटा दीजिए।”

  यह बात सुनकर हनुमानजी ने एक पर्वत और उठाया और अपने सर पर रख लिया।

अब शनिदेव को सारी बातें समझ आ गईं और शनिदेव हनुमानजी से क्षमायाचना करने लगे। उन्होंने हनुमानजी से क्षमा मांगी औऱ कहा, मैं आपको और आपके भक्तों को लभी भी परेशान नहीं करूंगा। आप धन्य हैं।”

और शनिदेव अपने लोक चले गए।

शनिदेव औऱ हनुमानजी की कई ऐसी ही कथाएं समाज में आज भी सुनने को मिलती हैं जिससे कि प्रेरणा ही नहीं बल्कि  हनुमानजी के प्रति आस्था और भी गहरी हो जाती है।

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विश्वास


हनुमान चालीसा

    बहुत समय पहले एक गांव में एक महिला रहती थी, वह हनुमान जी की बहुत बड़ी भक्त थी। उसके परिवार में वह औऱ उसका बेटा रहता था। उसके पति ने उसको छोड़ दिया था।

वह रातदिन मेहनत करती और अपने परिवार में अपने बेटे औऱ अपना पेट पालती थी।

    वह रोज सुबह उठती, नहा-धोकर हनुमानजी की आराधना करती, और फिर  वह घर का सारा काम निपटाकर काम पर निकल जाती थी। इसी प्रकार उसका दिन निकल जाता था।

वह हनुमानजी की बहुत बड़ी भक्त थी। अतः वह सुबह अथवा शाम को जब भी भोजन बनाती तो, पहले हनुमानजी को भोग लगाती और फिर स्वयं और अपने बेटे को खाना खिलाती थी।

वह हनुमानजी की भक्ति मे लीन रहती थी, हर कार्य को करने से पूर्व वह हनुमानजी का सुमिरन अवश्य करती थी। अपने घर और कार्य से उसको जितना भी समय मिलता उसे वह अपने आराध्य की भक्ति करने में व्यतीत करती थी।

  जब वह हनुमान जी को भोग लगाती थी तब वह एक विशेष प्रकार का मन्त्र बोलती थी, उसका मानना यह था कि उस विशेष प्रकार के मन्त्र से हनुमान भगवान उससे खुश हो जाते हैं,

और उसका भोजन का प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं।

  बहुत दिनों तक ऐसा ही चलते रहा। उसने अपने बच्चे की परवरिश अच्छे से की उसे अच्छे से पढ़ाया लिखाया और वह बड़ा होकर एक नौकरी करने लगा।

अब महिला को काम पर जाने की कोई जरूरत नहीं थी। दोनों मां-बेटे आपस में बहुत ही प्रेमभाव से रहते थे।

   अब महिला बूढ़ी होने लगी थी। उससे घर का काम-काज नहीं सम्भाला जाता था। अब उसने अपने बेटे का विवाह कराना सुनिश्चित किया। एक अच्छा परिवार देख कर उसने अपने बेटे की शादी करवा दी।

बहु के घर आने से महिला बहुत खुश थी। अब वही घर के सारे कार्य करती, उसका पति काम पर जाता और महिला, दिन रात हनुमानजी की सेवा में लगी रहती थी।

 महिला की आदतों को उसकी बहु रोज देखती थी, कि वह रोज अपने खाने से पहले हनुमानजी को भोग लगाती थी उसको यह बात कुछ ठीक नहीं लगती थी।

अब दिन कुछ विपरीत हो गए, महिला के बेटे का कार्य ठप हो गया। घर में आर्थिक स्थितियां कमजोर हो गयी।

  तब एक दिन जब महिला, हनुमान जी को भोग लगाने जा रही थी, तब उसे उसकी बहु ने टोका, और कहा, ” माजी घर में खाने के लाले पड़े हुए हैं और आप हैं कि भगवान को भोग लगाने जा रहीं हैं।

कोई भोग नहीं होगा चलिये आप अंदर।” इतना कहकर उसने अपनी सास को एक कमरे में बंद कर दिया। उसके पति को भी अपनी माँ की कोई चिंता नहीं थी।

Shree Hanuman Chalisa in hindi Story Motivational part-  6 दिन बीत गए महिला भूखी प्यासी उसी कमरे में पड़ी हुई थी।

लेकिन वह उस कठिन समय मे भी हनुमानजी को याद करना नहीं भूली।

   सातवें दिन उस कमरे में एक वृद्ध ब्राह्मण प्रकट हुए, वो भी उस ही भोजन के साथ जो कि वह महिला रोज हनुमानजी को भोग लगाती थी।

उन ब्राह्मण ने महिला को भोजन परोसते हुए वही मन्त्र बोले जो कि महिला बोला करती थी, भोग लगाते समय!

   महिला को कुछ समझ ही नहीं आया। ब्राह्मण वह भोजन की थाल वहीं रखकर अंतर्ध्यान हो गए। उनके जाने के बाद महिला को याद आया कि वह और कोई नहीं, बल्कि स्वयं बजरंगबली ही थे।

वह बहुत खुश हुई कि स्वयं भगवान ने उसे दर्शन दिए।

  अब वह भगवान का दिया हुआ अमृत रूपी भोजन खाने लगी। उधर उसकी बहु को याद आया कि उसने अपनी सास को कमरे में बंद कर के रखा हुआ था। जब उसने कमरे का दरवाजा खोला तो,

उसने देखा कि उसकी सासुमां खाना खा रही है। उससे रहा नहीं गया उसने पूछा, ” माजी आप तो एकदम हृष्ट पुष्ट दिख रही हो, और यह खाना कौन दे रहा है तुम्हें बन्द कमरे में?”

  उसके ऐसा कहने पर महिला ने सारी सच्चाई अपनी बहू को बता दी। अब दोनों सास-बहू मिलकर रोज हनुमानजी की पूजा करते औऱ उनको भोग लगाते। धीरे धीरे उनकी पारिवारिक स्थिति अच्छी होने लगी और सब खुशी खुशी रहने लगे।

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” सालासर बालाजी “


   एक समय की बात है, एक गांव में एक पुरूष रहता था। उसके दो पुत्र थे। बड़ा पुत्र तो ठीक ठाक था, हर कार्य में अपना मन लगाता था तथा दुनियादारी को भी अच्छे से समझता था।

लेकिन जो छोटा पुत्र था वह सामाजिक कार्यों में अपना मन नहीं लगा पाता था , उसकी रुचि बचपन से ही पूजा-पाठ की ओर था। वह बचपन से ही सन्यासियों की तरह अपना जीवन व्यतीत करता था,

उसका नाम था, महेशदास। जब वह 5-6 साल का हुआ तब उसकी एक बहन भी हुई।

    समय बीतता गया सभी बच्चे बड़े होने लगे। सबसे बड़ा पुत्र अब जवान हो गया था, तो उसकी शादी कर दी गयी। वह अपनी गृहस्थी में उलझ गया। अब बचे महेशदास और उसकी बहन।

बड़े भाई की शादी के पश्चात उनके पिताजी गुजर गए, मां तो बचपन में ही बहन के जन्म के बाद गुजर गई थी। बड़े भाई तो अपना परिवार पालने में व्यस्त थे, अब बहन और स्वयं की जिम्मेदारी महेश दास के ऊपर आ गयी।

महेश खूब मेहनत करता तब जाकर वह अपना और अपनी बहन का गुजारा कर पाता। अब वह दोनो भी बड़े हो गए! बड़े होने के साथ साथ महेशदास पर अपनी बहन की शादी की जिम्मेवारी भी आ गयी।

उसने इस बारे में अपने बड़े भाई से बात की। बड़े भाई और महेशदास ने मिलकर एक अच्छा घर देखा, और अपनी इकलौती बहन की शादी करा दी। अब घर में महेशदास अकेला हो गया। अब वह सन्यासियों की तरह ही रहने लगा।

  एक दिन उसके घर में एक भिक्षु आए, उन्होंने बाहर से उसको आवाज दी लेकिन वह अपनी पूजा में व्यस्त था तो, उन भिक्षु की आवाज वह सुन नहीं पाया। तब भिक्षु को क्रोध आ गया और वह अंदर आ गए,

भिक्षु ने महेशदास को श्राप दिया कि यदि वह किसी भी कन्या से विवाह करेगा तो वह कुछ ही दिनों में मर जयगी। भिक्षु का श्राप पाकर महेशदास के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं आई,

और उसने भिक्षु का श्राप सहर्ष स्वीकार कर लिया। और यह निश्चय किया कि अब वह जीवन भर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेगा और कभी भी शादी नहीं करेगा।

    वही उसकी बहन के बेटे के पैदा होने के बाद उसके पति की मृत्यु हो गई। अब बहन का सहारा बनने के लिए वह बहन के ही घर जाकर रहने लगा। मोहन और उसका भांजा दिन भर खेतों में काम करते और अपना घर चलाते थे।

एक दिन दोनों, मामा – भांजे खेत में काम कर रहे थे तो, महेशदास कुदाल से खेत जोत रहा था, जोतते जोतते उसकी कुदाल दूर जा गिरी । ऐसा लग रहा था,

जैसे कि किसी ने जबर्दस्ती उससे कुदाल छीनकर फेंक दी हो, ऐसा दो तीन बार हो गया। दूर खड़ा उसका भांजा यह सब देख रहा था। उसको लगा कि मामा की तबियत ठीक नहीं है,

तभी कमजोरी की वजह से उनके हाथ से कुदाल गिर रही है। वह महेशदास को लेकर घर गया और आराम करने को बोला।

तभी बाहर से आवाज आई , “भिक्षाम देहि….!”

जब महेशदास बाहर गया तो, उसने पाया कि बाहर तो कोई नहीं था। लेकिन एक परछाई जाती हुई दिख रही थी। उसको अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ।

Sankat Mochan Hanuman Chalisa in hindi Story Motivational part- उसको पता लग गया कि, ये औऱ कोई नहीं बल्कि स्वयं हनुमानजी ही आए थे।

उसने यह बात अपने भांजे और बहन को भी बताई।

  वहीं दूसरी ओर एक दिन उन्हीं लोगों के खेत पर एक किसान हल जोत रहा था तो उस समय उसे जमीन के नीचे हनुमानजी की एक प्रतिमा दिखाई दी उसने उसके ऊपर गौर नहीं किया और आगे बढ़ गया।

थोड़ी ही देर में उसके शरीर में बहुत तेज दर्द उठा औऱ वह जमीन पर गिर गया। वहां से गुजरते हुए एक व्यक्ति ने यह सब देखा तो उसको बात समझ में आ गयी। उसने जल्दी से जमीन के अंदर से भगवान की प्रतिमा निकाली।

जब उस पर से मिट्टी हटाई गई तो पाया कि वह प्रतिमा तो स्वयं बालाजी की थी, और वो भी राम-लक्ष्मण को कांधे पर बैठाए हुए। उन दोनों ने बालाजी भगवान से क्षमा याचना की,

और उसको मन्दिर में स्थापित करने का सोचा।

महेशदास भी बालाजी के लिए एक मन्दिर बनवाना चाहता था। तो उस ही दिन बजरंगबली स्वयं उसके सपने में आए और महेशदास से कहा, “कुछ लोग मेरी प्रतिमा मन्दिर में स्थापित करने वाले हैं, तुम भी आ जाना वहां पर।”

सभी मन्दिर पहुंचे और बालाजी की प्रतिमा को स्थापित किया। उस स्थान का नाम सालासर था अतः उस मंदिर का नाम तब से “सालासर बालाजी मन्दिर ” पड़ गया।

वर्तमान में यह मंदिर राजस्थान में स्थित है। यह बालाजी का एकमात्र ऐसा मन्दिर है, जिसमें बजरंगबली दाड़ी-मूछो सहित विद्यमान हैं।

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हनुमान चालीसा कहानी


” पंचमुखी हनुमान की कथा “


   रामायण काल की ही बात है, जब रावण और भगवान श्री राम के मध्य युद्ध छिड़ गया तो, राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों  के पराक्रम के कारण पूरी लंका और रावण सेना में भय का माहौल बन गया।

सभी राम और लक्ष्मण को किसी भी उपायों से मार डालने का प्रयत्न करने लगे।

   रावण का पुत्र मेघनाद मारा गया। अपने पुत्र की मृत्यु से रावण बहुत दुखी हुआ। वह अपनी मां के पास गया और अपनी विचलनता का कारण बताया।

  रावण की मां ने उसे बताया कि, पाताल मे तुम्हारे दो मित्र रहते हैं, अहिरावन और महिरावन। लंका का राजा बनने के बाद रावण उनसे मिला ही नहीं था। अतः उसकी मां ने उसे सुझाव दिया कि वह पाताल लोक जाए।

और अपने मित्रों से सहायता मांगे। वे लोग अवश्य ही सहायता के लिए राजी हो जाएंगे।

  रावण शीघ्र ही पाताल लोक पहुंच गया। रावण के पाताल पहुंचने पर उसका खूब स्वागत हुआ और अहिरावन और उसका भाई महिरावन अपने मित्र से मिलकर बहुत खुश हुए।

लेकिन रावण तो कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था तो उसने अपनी सारी दुविधाओं को अहिरावन और महिरावन क सामने रख दिया। रावण ने दोनों को राम और लक्ष्मण के बारे में बताया।

   अहिरावन और महिरावन दोनो भाइयों ने रावण को विश्वास दिलाया कि अब वह निश्चिंत हो जाए।

वहीं हनुमानजी को आभास हो गया था कि, उनके प्रभु के ऊपर कोई न कोई समस्या जरूर आने वाली है, प्रभु राम की कुटिया सुमेरु पर्वत में थी और हनुमानजी को किसी कार्यवश बाहर जाना था।

अतः हनुमानजी ने कुटिया के बाहर एक रक्षा कवच बना दिया ताकि कोई अंदर प्रवेश न कर सके। हनुमानजी कवच का निर्माण कर वहां से चले गए।

  जब राम-लक्ष्मण दोनो ही अपनी कुटिया में आराम कर रहे थे तो, अहिरावन उस स्थान पर पहुंच गया। और एक मधुमक्खी का रूप धारण कर लिया। लेकिन वह कुटिया में प्रवेश नहीं कर पा रहा था।

उसको पता लग गया कि कुटिया के बाहर किसी ने सुरक्षाकवच का निर्माण किया है जिस कारण मैं अंदर नहीं जा सकता। अब उसने एक योजना सोची। उसने भगवान राम के प्रिय विभीषण का रूप धरा।

और बाहर से ही राम और लक्ष्मण को आवाज लगाने लगे। दोनो भाई विभीषण की आवाज को सुनकर बाहर आए और जैसे ही दोनो ने उस रक्षा कवच को पार किया वैसे ही,

अहिरावन अपने असली रूप में आ गया। उसने अपनी माया के प्रयोग से राम और लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया। और अपने साथ पाताल लोक ले गया।

  विभीषन को यह बात रावण के दूतों से पता लगी कि प्रभु राम को अहिरावन छल से पाताल लोक ले गया है और उनकी बलि देना चाहता है।

वह जल्द से हनुमान के पास गया और हनुमानजी को यह पूरी बात बता दी। हनुमानजी चिंता मे पड़ गए और पाताल लोक के लिए निकल पड़े।

   पताल जाने के मार्ग में समुद्र तट पर हनुमानजी को एक प्राणी दिखाई दिया, जो कि आधा वानर रूप में था और आधा मत्स्य रूप में इसने हनुमानजी को पाताल जाने नहीं दिया।

तब दोनों के मध्य युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान हनुमानजी ने उससे पूछा कि उसकी यह दशा कैसे हुई, तब उसने हनुमानजी को बताया कि, मैं मकरध्वज हूँ और महाबली हनुमान का पुत्र हूँ।

जब वे लंका दहन के बाद इस समुद्र में आए थे तब उनकी पसीने की एक बूंद समुद्र में गिरी  और मेरी मां ने जब आहार ग्रहण करने के लिए अपना मुख खोला तब मैं मां के गर्भ से उतपन्न हुआ तभी मेरा शरीर ऐसा  है।

हनुमानजी भाव-विभोर हो गए और अपने पुत्र को गले से लगा लिया। हनुमानजी ने कहा, ” पुत्र मैं ही हूँ तुम्हारा पिता! हनुमान।” मकरध्वज अपने पिता से मिलकर बहुत खुश हुआ।

लेकिन वह यह समझ नहीं पाया कि वे पाताल लोक क्यों जाना चाहते हैं।

तब हनुमानजी ने मकरध्वज को सारी बातें बता दी।

अब मकरध्वज ने उन्हें बताया कि, अहिरावन और महिरावन दोनो ही माँ कामाक्षी के बहुत बड़े भक्त हैं और वे दोनों कुछ ही क्षणों में दो युवकों की बलि देने वाले हैं लगता है वे दोनों ही राम-लक्ष्मण हैं।

तब हनुमानजी बोले , ” पुत्र शीघ्रता से मुझे उस मन्दिर के पास ले चलो।”

दोनो ही पाताल में माँ कामाक्षी के मन्दिर पहुंच गए। तब हनुमानजी ने मां कामाक्षी का आह्वान किया और उनसे पूछा कि क्या वे सच में भगवान राम और भ्राता लक्ष्मण की बलि चाहती हैं?

Hanuman Chalisa Story Motivational part- तब माँ कामाक्षी प्रकट हुईं और बोली,  “नहीं मैं ऐसा बिल्कुल भी नही चाहती। बल्कि मैं तो अहिरावन और महिरावन की बलि चाहती हूं।

वे दोनों मेरे भक्त तो हैं लेकिन अधर्म के मार्ग पर है।

वे दोनों मुझे प्रसन्न करने के लिए पांच दिए जलाते हैं। यदि तुमने उन पांचों दियों को एक साथ बुझा दिया तो, दिए तो बूझेंगे ही साथ में उनके ऊपर से मेरा प्रभाव भी खत्म हो जाएगा और फिर तुम उन दोनों की बलि चढ़ा सकते हो।”

 इतना कहकर माता कामाक्षी अंतर्ध्यान हो गई।

  इतने में अहिरावन और महिरावन दोनो राम-लक्ष्मण को लेकर मन्दिर पहुंच गए। मकरध्वज और हनुमानजी ने दोनों से युद्ध किया। युद्ध के दौरान जैसे ही हनुमानजी अहिरावन को मारते वैसे ही वहां पांच अन्य अहिरावन उतपन्न हो जाते।

तब मकरध्वज ने बताया कि यह दोनों तंत्र विद्या के ज्ञानी हैं इनकी शक्तियां हमें कभी भी विजयी होने नहीं देंगी। इसकी पत्नी है, चित्रसेना वह इसको बिल्कुल भी पसन्द नहीं करती है,

यदि आप उसके पास जाओगे तो वह आपको अवश्य ही इन दोनों की मृत्यु का रहस्य बता देगी।तब तक मैं इन दोनों को रोक कर रखता हूँ। आप उससे इन दोनों का मृत्यु रहस्य जानकर आइए।

   हनुमानजी चित्रसेना के पास गए।  और उससे अनुरोध किया कि वह उन दोनों भाइयों की मृत्यु का रहस्य बता दें।

चित्रसेना ने भ्रमरों का रहस्य बताया। अब हनुमानजी ने वहां उपस्थित सभी भ्रमरों को मार डाला।

  दूसरी ओर अब दोनों भाइयों को चिंता होने लगी कि,उनकी शक्तियां कम कैसे हो रही हैं। हनुमान जी अपने पुत्र का साथ देने के लिए युद्ध क्षेत्र पहुंच गए।

अब हनुमानजी को माता कामाक्षी की बात याद आई कि उन दोनों भाइयों की बलि देने के लिए उन पांच दियों को  बुझाना अत्यंत आवश्यक है। तब हनुमानजी ने अपने पुत्र से कहा कि वह वायु के झरोखे वाला युद्ध प्रारंभ कर दे। लेकिन उससे कुछ नहीं हुआ।

दिए बुझने का नाम नहीं ले रहे थे।

    तब हनुमानजी ने अपना रूप बदला और एक पंचमुखी रूप धारण किया। अपने एक – एक करके पांचों मुख से उन्होंने एक साथ पांचों दियों को बुझा दिया और मकरध्वज ने अपने पिता के साथ मिलकर मां कामाक्षी के मंदिर में उनकी बलि चढ़ा दी।

   प्रभु श्री राम और लक्ष्मण अभी भी मूर्छित अवस्था में थे। हनुमानजी ने प्रयास किया उनकी मूर्च्छा को भंग करने का। और बहुत समय के पश्चात प्रभु श्री राम और लक्ष्मण की मूर्च्छा भंग हुई।

हनुमानजी और मकरध्वज ने सारा घटना का वृत्तांत प्रभु राम को सुनाया।

  और इस प्रकार पंचमुखी हनुमानजी ने अहिरावन और महिरावन को उनकी सही जगह पहुंचा दिया। और प्रभु राम और इनके भाई लक्ष्मण को उनकी योजना से बचाया।


Conclusion | हनुमान चालीसा


आज आपने पढ़ी Hanuman Chalisa lyrics in Hindi. और साथ ही में कुछ हनुमान जी की कहानियाँ। आपको आज की हमारी यह हनुमान चालीसा पोस्ट कैसी लगी, बताइये कमैंट्स में, और बने रहिये के साथ।

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